Thursday, January 10, 2019

आरक्षण बिल पास, मोदी सरकार के सामने अब 29 लाख खाली पदों को भरने की चुनौती

सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए 10 फीसदी आरक्षण का बिल आखिरकार राज्यसभा और लोकसभा से पास हो गया है. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर के बाद अब ये बिल कानून में बदल जाएगा, लेकिन इसके साथ ही नरेंद्र मोदी सरकार के लिए नई चुनौती सामने होगी. लोकसभा चुनाव से ऐन पहले चले गए इस मास्टर स्ट्रोक के बाद मोदी सरकार के सामने खाली पड़े सरकारी पदों को भरने की चुनौती होगी.

बिजनेस टुडे के आंकड़ों के मुताबिक, केंद्र और राज्य सरकारों के विभागों में करीब 29 लाख पद खाली पड़े हैं जिन पर नियुक्ति हो सकती है. अब इस बिल के पास होते ही सामान्य वर्ग के करीब 3 लाख लोगों के लिए भी इस 29 लाख में आरक्षण के आधार पर जगह बनेगी.

हालांकि, केंद्र सरकार के सामने चुनौती ये है कि जो पद पिछले कई साल से खाली पड़े थे ऐसे में वह अचानक इनको किस प्रकार भरती है. इन 29 लाख खाली पदों को अगर अलग-अलग क्षेत्रों में देखें तो इस प्रकार है...

-    शिक्षा क्षेत्र में 13 लाख, जिसमें 9 लाख प्राथमिक शिक्षकों और 4.17 लाख नौकरी सर्व शिक्षा अभियान के तहत हैं.

-    1 लाख पोस्ट सेकेंड्ररी लेवल शिक्षकों के लिए, अगस्त 2018 तक केंद्रीय विद्यालय में भी 7885 शिक्षकों के लिए जगह.

-    पुलिस में भी 4.43 लाख पद खाली पड़े हैं. अगस्त 2018 तक सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स और असम रायफल्स में भी 61578 पद खाली पड़े हैं.

-    सभी मंत्रालयों में मौजूद 36.3 लाख नौकरियों में से कुल 4.12 लाख पद खाली हैं. सिर्फ रेलवे में ही 2.53 लाख नौकरियां रेलवे में खाली हैं.

-    नॉन गैजेट कैडर में भी 17 फीसदी नौकरियां हैं. जिनमें 1.06 लाख पद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, 1.16 लाख पद आंगनवाड़ी हेल्पर के पद पर खाली पड़े हैं.

-    IAS, IPS, IFS जैसे पदों पर क्रमश: 1449, 970, 30 पद खाली हैं.

-    इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट में भी नौ जज के पद खाली पड़े हैं. इसके अलावा देश की कई हाई कोर्ट में 417,  सहऑर्डिनेट कोर्ट में भी 5436 पद खाली पड़े हैं.

-    राजधानी दिल्ली के एम्स में 304 फेकलटी मेंबर के पद अभी भी भरे जाने बाकी हैं.

एक आंकड़े की मानें तो इस समय केंद्र सरकार सरकारी अफसरों की तन्ख्वाह पर ही पर ही 1.68 लाख करोड़ रुपये खर्च करता है. इसके अलावा 10000 करोड़ रुपये तमाम तरह की पेंशनों पर भी खर्च होते हैं.

गौरतलब है कि सामान्य वर्ग को आर्थिक रूप से दिए जाने वाले आरक्षण के फैसले को केंद्र सरकार का लोकसभा चुनाव से पहले मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है. हालांकि, कानून बनने के बाद इसे लागू करवाना एक बड़ी चुनौती के रूप में होगा.

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